विलुप्त चिकित्सक: एक भयंकर घटना.

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© डॉ. राजस देशपांडे
न्यूरोलॉजिस्ट, रूबी हॉल क्लिनिक पुणे.

“सर हम कोंकण से आये हैं” उस पिता ने कहा, “आप से कुछ सलाह लेनी थी और मेरे बेटे के लिए आर्शीवाद भी लेने थे. डॉक्टरी की पोस्ट ग्रेजुएट परीक्षा में मेरे बेटे ने बहुत अच्छा रैंक पाया है. उसे किसी भी विषय में एम्. डी. या एम्. एस. मिल सकता है. अब आप ही बताइये उसकेअच्छे भविष्य के लिए उसे किस विषय में पोस्ट ग्रेजुएशन चुनना चाहिए”.
मैंने उस जीनियस विद्यार्थी को बधाई दी. मेडिकल में कोई भी परीक्षा अच्छी श्रेणी में पास होना बहुत कठिन उपलब्धि होती है. इसके लिए टैलेंट के साथ साथ कड़ी म्हणत भी जरूरी होती है. लेकिन ऐसी बौद्धिक उपलब्धियों को हमारे देश में कोई नहीं सराहता. हमारा समाज सिर्फ बाहरी सुंदरता, बॉडी बिल्डर्स, ग्लैमर, पैसेवाले लोग भाषणबाजी करने वाले तथा क्रिकेट खेलनेवालों को सर आँखों पर रखता है!
कुछ देर उस विद्यार्थी से बात करने पर मुझे ये यकीन हुआ के वह काफी दयालु, शांत, मेहनती और संवेदनशील था. उसका तर्क-वितर्क तथा विश्लेषण निर्दोष तो था ही, पर उसकी विचार क्षमता भी प्रशंसनीय थी. एक अच्छा चिकित्सक / शल्यचिकित्सक बनने के लिए जरूरी सारे गुण इस डॉक्टर में थे. दुनिया में ऐसे डॉक्टर दिनबदिन कम होते जा रहे हैं. मैंने उसे मेडिसिन विषय में एम्. डी. करने की सलाह दी. © डॉ. राजस देशपांडे

थोडासा कतराते हुए उसने कहा, “सर मैंने हमारे फॅमिली डॉक्टर को एक गुंडे राजनितिक से बुरी तरह पीटते देखा है. जब उन गुंडों ने हमारे डॉक्टर की पिटाई करते हुए उनके बीवी-बच्चों के सामने उन्हें अश्लील गालियां दी, तब उनके बाकी पेशेंट इस घटना का वीडियो ले रहे थे, बजाय के उस डॉक्टर की मदद करें. डॉक्टर साहब अपनी फॅमिली के साथ शहर छोड़ गए , पता नहीं कहाँ. अब मैं पेशेंट्स से संपर्क वाली किसी भी ब्रांच में नहीं जाना चाहता”.

मैंने उसके पिता से अनुरोध किया: “आपके बेटे में एक बढ़िया चिकित्सक होने के लिए आवश्यक सारे बेहतरीन गुण मौजूद हैं. हमारे देश को, सारी दुनिया को ऐसे डॉक्टरों की कड़ी ज़रुरत हैं. ये जरूरी नहीं के वह आपके शहर में या भारत में ही प्रैक्टिस करे. कृपया इसके बारे में सोचिये, अच्छे डॉक्टर आजकल नहीं मिलते. अगली पीढ़ी के बारे में भी सोचिये”.© डॉ. राजस देशपांडे

उस व्यथित पिता ने कुछ देर सोचकर कहा, “पता नहीं सर, क्या करें. जब इसने कहा के ये डॉक्टर बनेगा, तो इसकी माँ और हमने सोचा की ये बहुत लोगों की सेवा करेगा, बहुत लोगों की जान बचाएगा. पर जब हमने अपने हो फॅमिली डॉक्टर को एक बदमाश राजनितिक और उसके साथ वाली भीड़ के हाथों पीटते देखा, तो हम समझ गए की इस देश का डॉक्टर कितना मजबूर और असुरक्षित है. हमारे फॅमिली डॉक्टर को तो लोग भगवान मानते थे, पच्चीस सालों से सारे गांव के लोगों की उन्होंने सेवा की थी, पर जब एक गुंडा और उसके साथी उन्हें पीटने लगे, तो उनका किया सारा अच्छा काम एक मिनट में सारे भूल गए. उनके मार खाते वीडियो वायरल बने, मीडिया ने उन्हें सारे देश के सामने जलील किया. हम नहीं चाहते हमारे बेटे को कभी ऐसे लोगों से उलझना पड़े. अगर इसकी जगह बेटी होती, तो उसे डॉक्टर भी नहीं बनाते, क्योंकि हमारे देश में एक स्त्री डॉक्टर को न ही सिर्फ ऐसे गुंडे सताते हैं, पर उनको दोगनी मेहनत भी करनी पड़ती है. ये हमरा इकलौता बेटा है, हम चाहते है के ये हमारे पास ही भारत में रहे”.

फिर उन्होंने पूछा: “वैसे अगर इसकी जगह आपका बेटा होता तो आप क्या सलाह देते?”

इस सवाल से मेरे दिमाग में एक विस्फोट-सा हुआ.
मेरे माता पिता ने, शिक्षकों ने तो मुझे हरदम अच्छाई, ईमानदारी और सहिष्णुता की राह चलना सिखाया था. अगर मेरे बेटे डॉक्टर बनते, तो वे भी यही सीखते, बहुत अच्छा डॉक्टर बनने की क्षमता उनमे थी. ये भी सोचकर मेरा दिल दहलता है के कुछ ही सालों में अच्छे डॉक्टर करीब करीब विलुप्त होंगे. अगली पीढ़ी को अच्छी वैद्यक-सलाह मिलना नामुमकिन होगा. पर फिर भी, मैं अपने बच्चों को डॉक्टर बनाना नहीं चाहता था. ये अलग बात है के मेरी हालत, जिन कठिनाइयों का सामना मैंने किया उन्हें देखकर मेरे बेटों ने खुद ही अलग राह चुनी, पर मैंने भी कभी उन्हें डॉक्टर बनने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया. हर पिता चाहता है उसकी औलाद एक अच्छी और सुरक्षित जिंदगी जिए, मगर भारत में एक डॉक्टर के लिए ये मुमकिन ही नहीं. मैं नहीं चाहता के मेरे बेटे सालों कड़ी मेहनत करके लोगों की जान बचाते हुए भी गुंडे-मावली तथा राजनीतिकों की दहशत में अपनी ज़िन्दगी गुजारें. मैं नहीं चाहता के अनपढ़, गँवार लोगों की बनी कमिटियां उनकी तनख्वाह तय करें. मैं अपने बेटों को मुफ्तखोरों के वोटों के भिखारी राजनीतिकों की जंजीरों में नहीं बांधना चाहता. © डॉ. राजस देशपांडे

जो विचार मैं अपने बेटों के लिए करूँ , वही अगर मैं उनके बेटे के लिए नहीं करूँ तो ये तो पाखंड हुआ! हर अच्छा डॉक्टर अपने हर पेशंट के लिए ऐसे ही तो निर्णय लेता है.

मैंने उसे वही बताया जो मैंने अपने बेटों से हरदम कहा : “जिस काम से तुम्हारे मन को ख़ुशी मिले, ह्रदय में शांति बानी रहे, तुम्हे खुद के लिए और अपनों के साथ गुजरने के लिए वक़्त मिले, जिस काम से अच्छी कमाई तो हो, पर कोई और आपकी कीमत नहीं तय करे ऐसा काम, ऐसे विषय में पोस्ट ग्रेजुएशन चुनें. समाज सेवा के तो बहुत अवसर मिलेंगे, एक अच्छा इंसान होने की मिसाल आप बनें, भले किसी भी विषय में हो”. मैंने उसे दो पोस्टग्रेजुएट विषय भी सूचित किये, जिनमे ये सब संभव था.

ये सच्चाई अब हमें स्वीकार करनी होगी, के अच्छे डॉक्टर अब विलुप्त हो रहे हैं. डॉक्टरों की संख्या बढ़ते हुए भी आजकल पेशंट एम्बुलेंस में सफर करते हुए रास्ते में ही मर जाते हैं, क्योंकि अच्छे दवाखाने भारत के लगभग सभी घरों से दूर हैं. कुछ अनाथ तो सरकारी दवाखाने का भी खर्चा नहीं उठा पाते, जो घर में ही तमाम हो जाते हैं.

उस पिता ने बेटे से मेरे पैर छूने को कहा. जब उसने मेरे पैर छुए, तो मुझे अपनी ही सलाह की उदासीनता काट गयी. अपने महान डॉक्टरी पेशे का मैं कभी भी अवमान नहीं होने देना चाहता. © डॉ. राजस देशपांडे

“देखो बेटे, मैं ये बात अपने उसूलों के खिलाफ कर रहा हूँ. मैं भी जूझ रहा हूँ इस बात से!. पर आप एक अच्छा चिकित्सक होने के बारे में ज़रूर सोचो, भले ही आप किसी और सुरक्षित देश में अपना व्यवसाय करो. अपने माता-पिता को भी आप अपने साथ ले जा सकते हो. आप खुद की ख़ुशी के लिए जो भी पर्याय चुनोगे, वो अच्छा ही रहेगा, पर एक उत्कृष्ट चिकित्सक या शल्य चिकित्सक बनना हर किसी के बस की बात नहीं, इसके लिए असाधारण टैलेंट आवश्यक तो है ही, पर एक दुर्लभ विशेषता आपके व्यक्तित्व में होनी चाहिए, जो बहुत कम डॉक्टरों में पाई जाती है. मुझे आशा है आप इसके बारे में सोचोगे”.

मेरा शुक्रिया अदा करके जैसे ही वे दोनों बाहर निकले, एक युवा युगल अपने शिशु को लेकर अंदर आ गया. माता पिता की गोद में वह बेखबर शिशु खुश था, मुझे भी उसने एक मीठी-सी मुस्कान दी. उस मासूम नन्ही जान को ये अभी पता नहीं था के मैंने उसके भविष्य के लिए एक कीमती तोहफा अभी अभी बनाया था!

© डॉ. राजस देशपांडे
न्यूरोलॉजिस्ट, रूबी हॉल क्लिनिक पुणे.

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