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एक आशीर्वाद का रंग (डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की स्मृति को समर्पित)

एक आशीर्वाद का रंग
(डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की स्मृति को समर्पित)
© डॉ. राजस देशपांडे
न्यूरोलॉजिस्ट पुणे

दवाई की मात्रा को सावधानी से गिनकर मैंने इंट्रावेनस सोल्यूशन तैयार किया. सुई पहले से ही लगाकर रखी थी. “मैं दवाई का इंजेक्शन शुरू कर रहा हूँ. अगर कोई भी तकलीफ हो तो तुरंत बताइये, मैं यहीं बैठा हूँ” मैंने उस बूढी औरत से कहा. अपने दर्द की परतों के पीछे से वह मुस्कुराई. उसका बेटा, मेरा लेक्चरर डॉ. एसके , वहीँ खड़ा था. उसने अपनी माँ के सर पर हाथ रखा, और कहा, “ये मेरा विद्यार्थी यहीं रुकेगा. मुझे बाकी पेशंट देखने हैं, आज काफी भीड़ हैं. तू चिंता न कर माँ, अगर कुछ जरूरत हो तो इसे बता देना”. वह चला गया.

डॉ. एसके की माँ को कैंसर के लिए कीमोथेरेपी दी जा रही थी. इसमें से एक दवाई का सॉलूशन तैयार करना और उसे इंट्रावेनस (खून की नसों में से) बराबर मात्रा में देना काफी मुश्किल काम था. मेरे गाइड डॉ. प्रदीप (पिवाय) मुळे ने मुझे कुछ दिन पहले ही इस दवाई के बारे में सिखाया था, इसलिए डॉ. एसके ने मुझे बुलाया था. मैं तब एक सरकारी दवाखाने में अपने एमडी मेडिसिन के पहले वर्ष का रेजिडेंट डॉक्टर था.

कुछ समय के बाद मैंने देखा की उस पेशंट की यूरिन बैग (पेशाब की थैली) पूरी तरह से भर गई थी. वार्ड में काम करने वाली मौसी किसी और काम से बाहर गई थी. ऐसे हालात में एक रेजिडेंट डॉक्टर को हर काम करना पड़ता है. मैंने ग्लव्स / दस्ताने पहनकर नर्स से एक बाल्टी मांगी, और यूरिन बैग से उसमें पेशाब निकलकर वार्ड के बाथरूम की तरफ चल पड़ा. तभी डॉ. एसके वापिस आ गए. उन्होंने मुझसे वह बाल्टी मांगी, कहा “मैं ले जाता हूँ” पर मैंने कहा के मैंने ग्लव्स पहने हैं, मैं ही रखकर आता हूँ. मैंने वह बाल्टी वार्ड के बाथरूम के बाहर रख दी, मौसी बाद में उसे साफ़ कर देती. © डॉ. राजस देशपांडे

जब दवाई ख़त्म हुई, तो डॉ. एसके ने मुझे चाय पीने के लिए साथ चलने के लिए कहा. हॉस्पिटल के पीछे ही एक छोटी सी चाय की दुकान थी. थोड़ा हिचकिचाने के बाद उन्होने कहा : “सुनो, ग़लतफ़हमी न हो, लेकिन जब मैंने देखा कि तुम मेरी माँ के पेशाब की बाल्टी लेकर जा रहे थे, मुज्झे अचम्भा सा हुआ. तुम ब्राह्मण हो ना? जब तुम बाहर थे, तो मेरी माँ ने भी मुझ पर गुस्सा किया, और कहा, क्यों मैंने तुम्हे वो बाल्टी उठाने दी. हम बहुजन समाज से आते हैं. तुम्हे पता भी होगा, मैं अपने समाज के एसोसिएशन का नेता हूँ.”.

मुझे पता था. डॉ. एसके के नाम से काफी लोग डरते थे. पर एक निहायत बेडर और आक्रामक नेता होने के बावजूद वो एक अच्छे दिलवाला इंसान भी था. जब भी किसी पर अन्याय होता, तोह बिना जाति-पाती के बारे में सोचे वो उसकी मदद करता. गरीबों के लिए उसे विशेष प्रेम और सहानुभूति थी. किसी तरह का भेदभाव उसे पसंद नहीं था.

मैंने कहा “सर, मैं ये सब नहीं सोचता. पेशेंट तो पेशंट ही होता है, पर यहाँ वो आपकी माँ भी हैं, जो भी उसके लिए करना पड़े मेरा तो कर्त्तव्य बनता है. मैं अपने मन में कभी जाति-पाती का विचार न करूँ, न ही कभी किसी से भेदभाव करूँ, ये ही तालीम मुझे मेरे माता पिता ने मुझे बचपन से दी है”. © डॉ. राजस देशपांडे

“ठीक है”, उन्होंने कहा, “मेरा तुम्हारे बारे में कोई पूर्वग्रह / प्रेज्यूडिस था, वो अब चला गया. अगर तुम्हे कोई भी विपत्ति कभी भी हो, तो बड़ा भाई समझकर मुझे बता देना.” . कितनी ईमानदारी और धैर्य से उन्होंने एक कठिन बात को सरलता से कहा था!
जबतक अपने आप को दुसरे भारतीयों से ऊंचा या अलग समझने वाले हर भारतीय को कोई पश्चिमी जातिवादी (रेसिस्ट) “ब्राउन / ब्लैक” कहकर नीचा नहीं दिखता, उसे भेदभाव का दर्द नहीं समझ सकता.

संयोग से, कुछ दिन बाद ही, मेरी अपने एक प्रोफेसर से कुछ तू तू मैं मैं हो गई . उन्होंने मुझे अपने चैम्बर में बुलाकर कहा ” जब तक मैं तेरा एग्जामिनर हूँ, तू पास नहीं होगा”. मैं परेशान हो गया. मेरी आर्थिक स्थिति तो खस्ता हाल थी ही, पर मेरा बेटा अभी छोटा सा था और मेरे माँ-बाप मेरे वापिस आकर उनके पास रहने कि आस लगाए बैठे थे. फेल होना मेरे लिए बहुत बड़ी मुश्किल खड़ी कर देता. © डॉ. राजस देशपांडे

मैंने डॉ. एसके से मिलकर मेरी परेशानी बताई. वो मुझे उस प्रोफेसर से मिलने ले गए. पहले उन्होंने मुझसे कहा के मैं उस प्रोफेसर से माफ़ी मांगू, बहस के लिए. मैंने माफ़ी मांग ली. फिर उन्होंने उस प्रोफेसर से कहा “राजस मेरा छोटा भाई है.इसे कभी कोई धमकी न देना. अगर ये परीक्षा में अच्छा परफॉर्म करें, तो इसे पास कीजिये, अगर नहीं, तो आप इसे भले ही फेल कीजिये. लेकिन अच्छा परफॉर्म करने के बावजूद भी अगर ये फ़ैल होगा, तो मैं जरूर आप के खिलाफ आवाज उठाऊंगा. बाकी तीन परीक्षकों से मैं पूछूंगा”.
प्रोफेसर साहब ने तब कहा के उन्होंने ज्यादा गुस्से में मुझे धमकी दी थी, उनका मुझे फ़ैल करने का कोई इरादा नहीं था. बात यहीं मिट गई.

परमात्मा कि कृपा, अच्छे गुरुजन और कड़ी मेहनत के कारण मैं अपनी एमडी मेडिसिन कि परीक्षा पहली ही बारी में ही पास हो गया. जब मिठाई लेकर मैं डॉ एसके के पैर छूने पहुंचा, तो उन्होंने मुझे अपनी माँ से भी मिलाया. उस ने अपने बटुए से सौ रुपये निकलकर मुझे दिए ही, पर बहुत प्यार से ढेर सारे आशीर्वाद भी दिए. © डॉ. राजस देशपांडे

अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों में मेरे बहुत सारे दोस्त थे, समाज के सारे वर्गों से. विद्यार्थी कभी जाति के बारे में सोचकर दोस्त नहीं बनाते. कॉलेज के दिनों में मेरे डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर एसोसिएशन के कार्यकर्ताओं से बहुत अच्छे सम्बन्ध थे, क्योंकि दो बार जब मैं किसी अन्याय के खिलाफ अकेला झगड़ रहा था, कोई साथ नहीं दे रहा था, तब उन्होंने मेरी बहुत मदद कि, उन्ही के कारण मैं अपनी ज़िन्दगी कि दो बड़ी लड़ाइयां जीत सका.

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के पास दुनिया का सबसे प्रभावशाली अस्त्र था: फाउंटेन पेन. यह भी एक कारण है जो मुझे उनके प्रति बहुत आदर है. किसी और शस्त्र-अस्त्र कि जरूरत ही आदमी को नहीं है! समाज के दो समुदायों के बीच का कोई भी वाद-विवाद कभी भी झगड़ा या हिंसाचार से खतम नहीं हो सकता. एक-दुसरे के प्रति आदर और प्रेम दिल में रखकर साथ चलने से ही हम सारे समाधान खोज सकते हैं.

भाग्यवश, भारत में कोई भी डॉक्टर किसी भी पेशंट के बारे में सोचते हुए जाति-पाती का विचार नहीं करता. जैसे कोर्ट के आँगन में एक जज का अमल सर्वोच्च होता है, वैसे ही भारत के हर मेडिकल कैंपस में इंसानियत ही सर्वोच्च मानी जाति है. ह्रदय हो या खून, दिमाग हो या सांस, ये किसी भी जाति के अलग नहीं होते. बड़े दिमाग कि तरह ही एक बड़ा दिल भी मानव कि उन्नति का एक प्रमुख मानदंड है. © डॉ. राजस देशपांडे

मेरा सपना, मेरी प्रार्थना है कि समाज के विभिन्न घटकों के बीच में विभाजित विचारों के ये काले बादल हमेशा के लिए नष्ट हों. हम सारे एक दुसरे को अपनी जैसा ही केवल एक इंसान समझें, कोई भेदभाव न रहे. विद्यार्थियों में हर दरवाजा खोलने की, हर दीवार तोड़ने की क्षमता होती है, उनसे हमें बहुत उम्मीद है.

किसी भी भेदभाव को न मानते हुए हर पेशंट कि ज़िन्दगी और स्वस्थ्य के लिए दिन रात काम करने वाले वैद्यक समाज में से एक होने का मुझे गर्व है. अपनी प्रैक्टिस से बाहर भी, मेरा ये मानना है के जिस भी भगवान कि मैं पूजा करता हूँ, वही मिझे मिलने वाले हर व्यक्ति में मौजूद हैं.

एक पेशंट के आशीर्वाद का कोई रंग नहीं होता, दुआ कि कोई जाति यही होती. एक डॉक्टर होने के नाते मेरा धर्म, मेरी जाति, और मेरा कर्त्तव्य सारे एक ही है: सिर्फ इन्सानियत.

डॉ. राजस देशपांडे
न्यूरोलॉजिस्ट
रूबी हॉल क्लिनिक पुणे

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